काश! चले कलम कागज़ पर, कोयल इसे सुनाये; झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये ! बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये; बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!
Sunday, 31 July 2011
स्वप्न सुरा के नगरी में, हम सब हैं प्याले-प्याले; टूट गए, कब उठ गए, ये खबर नहीं है प्याले को !
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