सोच-बूझ का मोल नहीं है, जीवन तो बस सपना सा है !
यह सपना भी विघ्न भरा है, हर कोशिश दुःख में रहता है!
पल-पल जिससे नेह लगाया, हार गया पग-पग उससे ही !
नियत गति जीवन-मृत्यु है , साँसों का आना जाना ही !
कुछ तो बात है.....
खुद से खुद को दूर करके, अजनबी खुद से बना;
जब मिला खुद से, तो कायनात मेरी हो गयी !
काश! चले कलम कागज़ पर, कोयल इसे सुनाये;
झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये !
बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये;
बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!
झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये !
बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये;
बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!
Sunday, 23 May 2010
Saturday, 22 May 2010
Sunday, 9 May 2010
"जिन्दगी"
जिन्दगी एक कह्कसे के सिवा, कुछ भी तो नहीं;
ये पानी के बुलबुले के सिवा कुछ भी तो नहीं !
फिर भी तूफां और मौजों को समेटे आह और
कराह के बीच की दूरियाँ नापती चलायमान है!
तो क्या इतनी परीक्षायें और अनंत इच्छाएं एक
बुलबुले और कह्कसे रूपी शून्य में विलीन होने के लिए है !
लगता है ये अपनी हर स्थिति में ही हमारी प्रेरणापुंज बनी
हुई है........अजश्र धारा की तरह निरंतर बहती जाती है,
मौजों में अठखेलियाँ करती है, करतल निनाद के साथ अपने
होने का अहसास दिलाती है, व बूंद-बूंद होकर अपने
परिवर्तनशील रूप में मिटते हुए-बनते हुए .....हर पहलू से
हमें जीवंत कर अनंत शून्यता में विलीन हो जाती है! यह एक
अमिट, अनंत व निरंतर चलने की प्रक्रिया है !
शायद यही ...है,.....यही .....है !!
ये पानी के बुलबुले के सिवा कुछ भी तो नहीं !
फिर भी तूफां और मौजों को समेटे आह और
कराह के बीच की दूरियाँ नापती चलायमान है!
तो क्या इतनी परीक्षायें और अनंत इच्छाएं एक
बुलबुले और कह्कसे रूपी शून्य में विलीन होने के लिए है !
लगता है ये अपनी हर स्थिति में ही हमारी प्रेरणापुंज बनी
हुई है........अजश्र धारा की तरह निरंतर बहती जाती है,
मौजों में अठखेलियाँ करती है, करतल निनाद के साथ अपने
होने का अहसास दिलाती है, व बूंद-बूंद होकर अपने
परिवर्तनशील रूप में मिटते हुए-बनते हुए .....हर पहलू से
हमें जीवंत कर अनंत शून्यता में विलीन हो जाती है! यह एक
अमिट, अनंत व निरंतर चलने की प्रक्रिया है !
शायद यही ...है,.....यही .....है !!
Saturday, 8 May 2010
!! कुछ अलग करो !!
कुछ अलग करो जीवन में, अथक रहे प्रयास;
घटना घटित होते रहती है, कभी कभी इतिहास !
बीहड़ कंकड़ भरी हो राहें, खोना ना विश्वास;
चलते रहो भटक राहों पर, बन जाये कुछ खास !
घटना घटित होते रहती है, कभी कभी इतिहास !
बीहड़ कंकड़ भरी हो राहें, खोना ना विश्वास;
चलते रहो भटक राहों पर, बन जाये कुछ खास !
Friday, 7 May 2010
!! हाल !!
पूछिये मत हाल, हर हाल में गाते रहे;
खुशियाँ तो ईद हुई, गम मुंह बाए है खड़ी !
रोना हँसना अब न रहा, एक लगता है सभी;
बस उठा रहा है बोझ, आदमियत का आदमी !
रो रहें हैं बाग, अब सूना लगे परिवार भी;
बंद हुआ कलरव गुंजन व नयनों का अंजन भी
खुशियाँ तो ईद हुई, गम मुंह बाए है खड़ी !
रोना हँसना अब न रहा, एक लगता है सभी;
बस उठा रहा है बोझ, आदमियत का आदमी !
रो रहें हैं बाग, अब सूना लगे परिवार भी;
बंद हुआ कलरव गुंजन व नयनों का अंजन भी
!! ठोकर !!
पग के ठोकर भी बने, अब अद्भुत हथियार;
हम समझे थे ठोकर लगी, दूर हुआ संसार !
अच्छा हुआ अपनों ने दिया, ठेस सौ-सौ बार;
ठोकर तो थी सीख, या मिली नहीं या बार-बार!
आज सहायक बन रही, ठोकर भी सौगात;
ठोकर मलय गंध भरा, अब जीवन मंद बयार !
हम समझे थे ठोकर लगी, दूर हुआ संसार !
अच्छा हुआ अपनों ने दिया, ठेस सौ-सौ बार;
ठोकर तो थी सीख, या मिली नहीं या बार-बार!
आज सहायक बन रही, ठोकर भी सौगात;
ठोकर मलय गंध भरा, अब जीवन मंद बयार !
Thursday, 6 May 2010
hmmm..
उहापोह सा जीवन करके, खुद से खुद को ही छलता हूँ;
क्षणभंगुर जीवन के पल है, इस पल में पल-पल मरता हूँ!
चाह हमें भी जीने का है, पर दुखों में युग-युग चलता हूँ;
विधि विवश कोशिश काफूर, खुद से अब रूठा रहता हूँ !
क्षणभंगुर जीवन के पल है, इस पल में पल-पल मरता हूँ!
चाह हमें भी जीने का है, पर दुखों में युग-युग चलता हूँ;
विधि विवश कोशिश काफूर, खुद से अब रूठा रहता हूँ !
!! कोशिश !!
कोशिश कर मेरे मन तुम भी, सफल चित्तेरे बनने का;
दूर भ्रमण करते रहता है, कोशिश कर मुझमे रहने का !
अथक प्रयास करते रहता हूँ, तुम्हे करीब बुलाने का ;
नियति से हम बंधें हुए हैं, पर कोशिश दीप जलाने का !
दूर भ्रमण करते रहता है, कोशिश कर मुझमे रहने का !
अथक प्रयास करते रहता हूँ, तुम्हे करीब बुलाने का ;
नियति से हम बंधें हुए हैं, पर कोशिश दीप जलाने का !
Tuesday, 4 May 2010
!! आशा !!
छूने की चाह है, हमें भी आसमान को;
क्रमशः ईटें जोड़ी, उन्नत किया अरमान को !
बहुत बार पहुँच चुका, ठेस मेरे अभिमान को;
हूँ रखता संभाल कर, अब अपने स्वाभिमान को !
गिरा बार-बार अब उठ चूका हूँ, फूकने पाञ्चजन्य को;
राह में उन्मत भी होकर यथार्थ में बदलूँगा ख्वाब को !
बहुत सो चुका, अब जगकर जलाऊंगा सुसुप्त मन को;
सोचा बहुत, चिंता भी क्या, जागृत करूँगा अब चिंतन को!
निष्फल न हो मेरी काया, तोड़ दूँगा बंधन को;
अर्पित हो मेरी यह काया, तुम्हे और जन-जन को!
हे सखी, हे सहचरी, अब ग्रहण करो कंगन को;
आशा, प्रेम, विश्वास से बाँध लो, चिरबंधन को !
क्रमशः ईटें जोड़ी, उन्नत किया अरमान को !
बहुत बार पहुँच चुका, ठेस मेरे अभिमान को;
हूँ रखता संभाल कर, अब अपने स्वाभिमान को !
गिरा बार-बार अब उठ चूका हूँ, फूकने पाञ्चजन्य को;
राह में उन्मत भी होकर यथार्थ में बदलूँगा ख्वाब को !
बहुत सो चुका, अब जगकर जलाऊंगा सुसुप्त मन को;
सोचा बहुत, चिंता भी क्या, जागृत करूँगा अब चिंतन को!
निष्फल न हो मेरी काया, तोड़ दूँगा बंधन को;
अर्पित हो मेरी यह काया, तुम्हे और जन-जन को!
हे सखी, हे सहचरी, अब ग्रहण करो कंगन को;
आशा, प्रेम, विश्वास से बाँध लो, चिरबंधन को !
Monday, 3 May 2010
Baaton baaton me...
आदतों से इश्क है, इबादतों में इश्क है,
इश्किया फिर क्या करें ये जहाँ ही इश्क हैं.
तुम कहो कि मैं कहूँ, मैं कहूँ कि तुम कहों,
ये कहा सुनी भी एक शब्द-रूप इश्क है.
खौफ़ से बेख़ौफ़ होकर जिन्दगी हमने जीया ;
क्या पता था मौत भी बेख़ौफ़ से मिल जाएगी !
खैरियत रही की कोई आज भी पास-पास है,
कब तलक कोई रहेगा, कब तलक कोई रहे!!
इश्किया फिर क्या करें ये जहाँ ही इश्क हैं.
तुम कहो कि मैं कहूँ, मैं कहूँ कि तुम कहों,
ये कहा सुनी भी एक शब्द-रूप इश्क है.
खौफ़ से बेख़ौफ़ होकर जिन्दगी हमने जीया ;
क्या पता था मौत भी बेख़ौफ़ से मिल जाएगी !
खैरियत रही की कोई आज भी पास-पास है,
कब तलक कोई रहेगा, कब तलक कोई रहे!!
मेरी हार्दिक चाह !
काश! चले कलम कागज़ पर, कोयल इसे सुनाये;
झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये !
बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये;
बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!
झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये !
बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये;
बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!
हौसला !
सो कर जिन्दगी काटी भी तो क्या काटी,
जग कर जिन्दगी का मजा लिया करो !!
गिर गए तो क्या हुआ, उठो-बढ़ो-चलो,
फिर उठ-बढ़-चलने का मजा लिया करो !
जग कर जिन्दगी का मजा लिया करो !!
गिर गए तो क्या हुआ, उठो-बढ़ो-चलो,
फिर उठ-बढ़-चलने का मजा लिया करो !
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