जाने कब से हँसी दफ़न हो चुकी है, और लोग पूछते हैं- इतना हँसते क्यों हो ?
समाज के थपेड़े खाकर बड़ा हुआ, अब समाज कहता है- निष्ठुर हो गए हो!!
जिन्दगी को किताब की तरह पढता गया, कुछ लोग कहते हैं- निपुण हो गए हो!
सदा जो करीब हैं, जिनको कभी भूला नहीं, अब वही सोचते हैं- गैर हो गए हो !!
कुछ तो बात है.....
खुद से खुद को दूर करके, अजनबी खुद से बना;
जब मिला खुद से, तो कायनात मेरी हो गयी !
काश! चले कलम कागज़ पर, कोयल इसे सुनाये;
झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये !
बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये;
बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!
झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये !
बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये;
बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!
Saturday, 31 July 2010
Friday, 30 July 2010
Wednesday, 14 July 2010
Saturday, 10 July 2010
Friday, 9 July 2010
Sunday, 4 July 2010
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