काश! चले कलम कागज़ पर, कोयल इसे सुनाये; झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये ! बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये; बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!
Thursday, 27 October 2011
मुझमे इस तरह शामिल, कि खुद को भूल जाता हूँ; निगाहें नम-सी रहती है, कभी जब याद आता हूँ !
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