काश! चले कलम कागज़ पर, कोयल इसे सुनाये; झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये ! बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये; बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!
Tuesday, 27 April 2010
मिज़ाजे मुफलिसी का बयां भी कुछ यही है, न खुद को देखता हूँ , न खुद से मिलता हूँ !!
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