काश! चले कलम कागज़ पर, कोयल इसे सुनाये; झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये ! बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये; बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!
Thursday, 29 April 2010
hmmm..
कुछ कदम चला करूँ , ये सोचता हूँ बार बार मंजिलें कहीं भी हों , पर राह ही हमारें यार !
बरबस कहीं पर हम भी बरसात में भींगे, कभी याद में भींगे, कभी फ़रियाद में भींगे !
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