काश! चले कलम कागज़ पर, कोयल इसे सुनाये; झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये ! बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये; बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!
Tuesday, 3 May 2011
गाता हूँ, गुनगुनाता हूँ, फ़ुरसत मिले तो मुस्कुराता हूँ; फ़ुरसत की मंदी में, मुश्किल से खुद को मिल पाता हूँ ! लाचार और बे-ज़ार जिन्दगी में क्या-क्या दिखाता हूँ जो मिला खोता गया, बस खोये ख्यालों में खो जाता हूँ !!
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