काश! चले कलम कागज़ पर, कोयल इसे सुनाये; झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये ! बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये; बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!
Saturday, 14 February 2015
खोता गया खुद को, तो वज़ूद का पता चला !
पता चला यही कि जो मैं हूँ , वो मैं नहीं हूँ !!
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