कुछ तो बात है.....

खुद से खुद को दूर करके, अजनबी खुद से बना;
जब मिला खुद से, तो कायनात मेरी हो गयी !

काश! चले कलम कागज़ पर, कोयल इसे सुनाये;
झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये !
बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये;
बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!


Tuesday, 27 April 2010

नयन-नीर में हमने भी कितने सपनों को धो डाला,
बीती की क्या बात करें, अभी शेष और भी हाला !

2 comments:

  1. Nicely written.Probably,every one would be agree with this.This is the concrete phiosphy of todays life.We all are facing this but despite we are marching ahead.Is it not reflecting our zest ?

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  2. धन्यवाद, पंकज! पहला, अच्छा और सार्थक टिपण्णी के लिए !

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