काश! चले कलम कागज़ पर, कोयल इसे सुनाये; झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये ! बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये; बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!
Sunday, 2 May 2010
"दिल ज़िगर जहां में तार-तार हो गएँ, हसरतों की बात क्या ख़ार-ख़ार हो गएँ, ख़्वाब भी हरे-भरे बार-बार हो गएँ; या तो कह लो, महफ़िलों में यार-चार हो गएँ !!"
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