काश! चले कलम कागज़ पर, कोयल इसे सुनाये; झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये ! बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये; बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!
Wednesday, 14 July 2010
सब्रे फ़िराक साथ में, काम के फ़िराक से, फुरसतें फ़िराक की उम्मीद कम-सी हो गयी !
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