काश! चले कलम कागज़ पर, कोयल इसे सुनाये; झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये ! बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये; बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!
Friday, 6 August 2010
बिरही मन अपना होता है, सुन लो ये अच्छा होता है ! खुद में रमने वाला ही, सीधा-सादा सच्चा होता है !!
No comments:
Post a Comment