काश! चले कलम कागज़ पर, कोयल इसे सुनाये; झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये ! बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये; बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!
Sunday, 1 August 2010
नरगिसी नैनों का जादू, आजतक चलता रहा ; उर्वशी के नृत्य पर विश्वामित्र घायल मलता रहा ! आह-वाह की दूरियाँ कबसे-कबतक नपता रहा; जीवन के मयखाने में नित-नव प्याला सजता रहा !!
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