काश! चले कलम कागज़ पर, कोयल इसे सुनाये; झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये ! बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये; बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!
Thursday, 19 August 2010
जात-पात, ऊँच-नीच से कबके दूर हो चुके हैं; पर घर की दहलीज़ अभी तक लांघ नहीं पाये ! दुनिया भले मुट्ठी में हो जाये, घर की झूठी आन में; सदा तार-तार हुएँ, न चल पाये न पल पाये !!
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