काश! चले कलम कागज़ पर, कोयल इसे सुनाये; झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये ! बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये; बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!
Friday, 7 May 2010
!! हाल !!
पूछिये मत हाल, हर हाल में गाते रहे; खुशियाँ तो ईद हुई, गम मुंह बाए है खड़ी ! रोना हँसना अब न रहा, एक लगता है सभी; बस उठा रहा है बोझ, आदमियत का आदमी ! रो रहें हैं बाग, अब सूना लगे परिवार भी; बंद हुआ कलरव गुंजन व नयनों का अंजन भी
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