छूने की चाह है, हमें भी आसमान को;
क्रमशः ईटें जोड़ी, उन्नत किया अरमान को !
बहुत बार पहुँच चुका, ठेस मेरे अभिमान को;
हूँ रखता संभाल कर, अब अपने स्वाभिमान को !
गिरा बार-बार अब उठ चूका हूँ, फूकने पाञ्चजन्य को;
राह में उन्मत भी होकर यथार्थ में बदलूँगा ख्वाब को !
बहुत सो चुका, अब जगकर जलाऊंगा सुसुप्त मन को;
सोचा बहुत, चिंता भी क्या, जागृत करूँगा अब चिंतन को!
निष्फल न हो मेरी काया, तोड़ दूँगा बंधन को;
अर्पित हो मेरी यह काया, तुम्हे और जन-जन को!
हे सखी, हे सहचरी, अब ग्रहण करो कंगन को;
आशा, प्रेम, विश्वास से बाँध लो, चिरबंधन को !
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