काश! चले कलम कागज़ पर, कोयल इसे सुनाये; झींगुर दे संगीत मधुर और बन्दर ढोल बजाये ! बाज़े डम-डम डमरू ऐसे भय,आतंक, चिंता मिट जाये; बन जाये कुछ बात की, जन-जन ख़ुशी मनाये !!
Tuesday, 4 May 2010
kya kahun...
शब्द देह-रूप है, कविता है जिन्दगी,बोल वो अमोल है, गाते जो बन्दिगी !
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