जिन्दगी एक कह्कसे के सिवा, कुछ भी तो नहीं;
ये पानी के बुलबुले के सिवा कुछ भी तो नहीं !
फिर भी तूफां और मौजों को समेटे आह और
कराह के बीच की दूरियाँ नापती चलायमान है!
तो क्या इतनी परीक्षायें और अनंत इच्छाएं एक
बुलबुले और कह्कसे रूपी शून्य में विलीन होने के लिए है !
लगता है ये अपनी हर स्थिति में ही हमारी प्रेरणापुंज बनी
हुई है........अजश्र धारा की तरह निरंतर बहती जाती है,
मौजों में अठखेलियाँ करती है, करतल निनाद के साथ अपने
होने का अहसास दिलाती है, व बूंद-बूंद होकर अपने
परिवर्तनशील रूप में मिटते हुए-बनते हुए .....हर पहलू से
हमें जीवंत कर अनंत शून्यता में विलीन हो जाती है! यह एक
अमिट, अनंत व निरंतर चलने की प्रक्रिया है !
शायद यही ...है,.....यही .....है !!
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